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Fri. Jan 23rd, 2026

महिला उपनिरीक्षक को न्याय, उत्तराखंड लोक सेवा अधिकरण ने दोनों आदेशों को बताया अवैध..

महिला उपनिरीक्षक को न्याय, उत्तराखंड लोक सेवा अधिकरण ने दोनों आदेशों को बताया अवैध..

 

 

 

उत्तराखंड: उत्तराखंड लोक सेवा अधिकरण (ट्रिब्यूनल) की नैनीताल पीठ ने एक महिला सब-इंस्पेक्टर को बड़ी राहत देते हुए विभागीय सजा को निरस्त कर दिया है। अधिकरण ने माना कि अल्मोड़ा के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) और कुमाऊं के पुलिस उपमहानिरीक्षक (आईजी) द्वारा दी गई निंदा प्रविष्टि बिना ठोस आधार और जल्दबाजी में दी गई थी। मामला उपनिरीक्षक तरन्नुम सईद से जुड़ा है, जो वर्तमान में काशीपुर जीआरपी चौकी इंचार्ज के रूप में तैनात हैं। उनके अधिवक्ता नदीम उद्दीन के माध्यम से दायर याचिका में कहा गया कि वर्ष 2021 में तरन्नुम सईद सल्ट थाने में पदस्थापित थीं। उस दौरान उन्हें एक सड़क दुर्घटना (रोड एक्सीडेंट) की जांच सौंपी गई थी। याचिका के अनुसार उपनिरीक्षक ने जांच के दौरान पूरी ईमानदारी से वाहन मालिक और गवाहों के बयान दर्ज किए।

उन्होंने मोबाइल लोकेशन और वीडियो साक्ष्य एकत्र करने की प्रक्रिया भी शुरू कर दी थी। इसी बीच मामला अचानक उनसे लेकर अन्य अधिकारियों को सौंप दिया गया। बाद में, बिना कारण बताए, उन्हें विभागीय जांच में दोषी ठहराते हुए निंदा प्रविष्टि दे दी गई। महिला उपनिरीक्षक ने अधिकरण में यह तर्क रखा कि उनके खिलाफ किसी प्रकार की लापरवाही या अनुशासनहीनता का कोई प्रमाण नहीं है। वहीं, पुलिस अधिकारियों की ओर से दिए गए आदेश को उन्होंने मनमाना और प्रक्रिया-विरुद्ध बताया।अधिकरण ने सभी दस्तावेजों और तर्कों को सुनने के बाद कहा कि विभागीय स्तर पर दिया गया दंड आदेश जल्दबाजी में पारित किया गया और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन नहीं किया गया। इसके साथ ही ट्रिब्यूनल ने सजा को अवैध घोषित करते हुए उसे रद्द कर दिया और आदेश दिया कि संबंधित अधिकारी को सभी सेवा लाभ यथावत प्रदान किए जाएं। इस निर्णय को महिला उपनिरीक्षक के लिए एक बड़ी राहत माना जा रहा है, जबकि यह फैसला पुलिस विभाग में विभागीय कार्रवाई प्रक्रिया के लिए भी एक अहम नजीर बन सकता है।

 

दरोगा ने कार्रवाई को एकतरफा बता कर दी थी चुनौती..

बाद में जांच अधिकारी ने अपनी रिपोर्ट में यह निष्कर्ष दिया कि दरोगा ने कथित रूप से जानबूझकर जांच को गलत दिशा में मोड़ा, ताकि वाहन मालिक को बीमा का लाभ मिल सके। इस रिपोर्ट के आधार पर एसएसपी अल्मोड़ा ने मई 2023 में उन्हें निंदा प्रविष्टि दे दी। तरन्नुम सईद की अपील भी आईजी कुमाऊं ने खारिज कर दी थी। महिला दरोगा ने इन दोनों आदेशों को उत्तराखंड लोक सेवा अधिकरण (नैनीताल पीठ) में चुनौती दी। उनके अधिवक्ता नदीम उद्दीन ने दलील दी कि यह कार्रवाई एकतरफा, मनमानी और बिना किसी ठोस सबूत के की गई है। ट्रिब्यूनल के प्रशासनिक सदस्य कैप्टन आलोक शेखर तिवारी ने अपने आदेश में कहा कि विभागीय जांच में न तो पर्याप्त सबूत प्रस्तुत किए गए और न ही गवाहों के बयान निर्णायक थे।

ऐसा प्रतीत होता है कि सजा केवल संदेह और जल्दबाजी के आधार पर दी गई। ट्रिब्यूनल ने न केवल एसएसपी अल्मोड़ा और आईजी कुमाऊं दोनों के आदेशों को रद्द किया, बल्कि यह भी निर्देश दिया कि उपनिरीक्षक तरन्नुम सईद की चरित्र पंजिका से निंदा प्रविष्टि 30 दिनों के भीतर हटाई जाए और उनके सभी रोके गए सेवा लाभ शीघ्र जारी किए जाएं। इस फैसले को पुलिस विभाग में विभागीय न्यायिक पारदर्शिता के लिए एक अहम नजीर माना जा रहा है। पुलिस विभाग के कई अधिकारी इसे एक ऐसा निर्णय मान रहे हैं जो भविष्य में विभागीय जांचों की प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और सबूत-आधारित बनाएगा।

 

 

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