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Fri. Jan 23rd, 2026

उत्तराखंड के हजारों सरकारी स्कूलों में घटती छात्र संख्या, बंदी की आशंका..

उत्तराखंड के हजारों सरकारी स्कूलों में घटती छात्र संख्या, बंदी की आशंका..

 

 

उत्तराखंड: उत्तराखंड की सरकारी शिक्षा व्यवस्था एक गंभीर मोड़ पर खड़ी नजर आ रही है। राज्य में एक-दो नहीं बल्कि चार हजार से अधिक सरकारी स्कूल ऐसे हैं, जो बंद होने की कगार पर पहुंच चुके हैं। इन स्कूलों में छात्र-छात्राओं की संख्या या तो 10 से कम है या फिर एक अंक तक सिमट गई है। हैरानी की बात यह है कि वर्ष 2025 में प्रदेश में एक भी नया सरकारी स्कूल नहीं खोला गया, जबकि शिक्षा सुधार और गुणवत्ता के नाम पर लगातार योजनाएं चलाई जा रही हैं और शिक्षा विभाग का सालाना बजट 12 हजार करोड़ रुपये से अधिक का है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार प्रदेश के प्राथमिक विद्यालयों की स्थिति सबसे ज्यादा चिंताजनक है। 4275 प्राथमिक विद्यालय ऐसे हैं, जहां छात्रों की संख्या 10 या उससे भी कम रह गई है। जिलावार स्थिति पर नजर डालें तो पौड़ी गढ़वाल में ऐसे स्कूलों की संख्या सबसे अधिक 904 है, जबकि हरिद्वार जिले में यह संख्या सबसे कम महज तीन है। यही नहीं, 2940 प्राथमिक विद्यालयों में छात्र संख्या 20 से कम, 1327 स्कूलों में 30 से कम और 1062 स्कूलों में 50 से कम छात्र अध्ययनरत हैं।

जूनियर हाईस्कूलों की स्थिति भी इससे बेहतर नहीं है। प्रदेश के 650 जूनियर हाईस्कूलों में छात्रों की संख्या 10 या उससे कम रह गई है। इनमें भी पौड़ी जिला शीर्ष पर है, जहां 120 जूनियर हाईस्कूल ऐसे हैं, जिनमें नाम मात्र के छात्र बचे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि पहाड़ी क्षेत्रों से हो रहा लगातार पलायन, निजी स्कूलों की बढ़ती संख्या और सरकारी स्कूलों के प्रति घटता भरोसा इसकी बड़ी वजह है। यह स्थिति तब है जब सरकारी स्कूलों में समग्र शिक्षा योजना, प्रधानमंत्री पोषण योजना (मिड-डे मील), मुख्यमंत्री मेधावी छात्र प्रोत्साहन छात्रवृत्ति, बालिका शिक्षा प्रोत्साहन योजना जैसी कई योजनाएं संचालित की जा रही हैं। इन योजनाओं पर हर साल करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं। इसके बावजूद सरकारी स्कूलों में छात्रों की संख्या बढ़ने के बजाय लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है।

बीते कुछ वर्षों में शिक्षा विभाग ने अटल उत्कृष्ट विद्यालय, पीएम श्री स्कूल, क्लस्टर विद्यालय जैसे कई नए प्रयोग किए, लेकिन इनका अपेक्षित असर जमीनी स्तर पर नजर नहीं आ रहा। शिक्षा से जुड़े जानकारों का कहना है कि जब तक शिक्षण गुणवत्ता, संसाधन, शिक्षक उपलब्धता और स्थानीय जरूरतों के अनुरूप स्कूलों का संचालन नहीं होगा, तब तक स्थिति में सुधार मुश्किल है। हालांकि विभाग से जुड़े कुछ शिक्षकों और अधिकारियों को उम्मीद है कि नया साल सरकारी शिक्षा व्यवस्था के लिए नई दिशा लेकर आएगा। उनका कहना है कि आने वाले समय में कुछ ठोस और व्यावहारिक कदम उठाए जाएंगे, जिससे सरकारी स्कूलों के प्रति अभिभावकों और छात्रों का भरोसा फिर से कायम किया जा सके।

 

 

 

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