Breaking
Sat. Feb 14th, 2026

तीन वर्षीय नियम ठंडे बस्ते में, व्यावसायिक पाठ्यक्रमों की फीस अब तक तय नहीं..

तीन वर्षीय नियम ठंडे बस्ते में, व्यावसायिक पाठ्यक्रमों की फीस अब तक तय नहीं..

 

 

उत्तराखंड: उत्तराखंड में निजी उच्च शिक्षण संस्थानों में मेडिकल, इंजीनियरिंग और अन्य व्यवसायिक पाठ्यक्रमों की फीस को लेकर लंबे समय से स्पष्टता का अभाव बना हुआ है। प्रवेश एवं शुल्क नियामक समिति के गठन के बावजूद तय मानकों के अनुरूप शुल्क निर्धारण अब तक नहीं हो सका है। हैरानी की बात यह है कि समिति के गठन के बाद से अब तक 12 अध्यक्ष बदल चुके हैं, लेकिन फीस पुनरीक्षण की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ पाई। नियमों के अनुसार समिति को प्रत्येक तीन वर्ष में निजी शिक्षण संस्थानों की फीस की समीक्षा कर उसे संशोधित करना होता है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि छात्रों से ली जाने वाली फीस निर्धारित मानकों के अनुरूप हो और संस्थान सुविधाओं के हिसाब से पारदर्शी शुल्क संरचना लागू करें। हालांकि व्यवहारिक स्तर पर यह प्रक्रिया प्रभावी ढंग से लागू नहीं हो पाई है। परिणामस्वरूप फीस को लेकर अक्सर विवाद की स्थिति बनी रहती है।

छात्रों की शिकायतें बनाम संस्थानों का पक्ष..

निजी संस्थान जहां दावा करते हैं कि उनकी फीस संरचना न्यायसंगत और आवश्यक खर्चों के अनुरूप है, वहीं छात्र-छात्राओं की ओर से मनमाने शुल्क वसूली के आरोप समय-समय पर सामने आते रहे हैं। छात्रों का कहना है कि कई संस्थानों में ली जा रही भारी फीस के अनुरूप बुनियादी सुविधाएं भी उपलब्ध नहीं हैं। प्रयोगशालाएं, पुस्तकालय, इन्फ्रास्ट्रक्चर और अन्य शैक्षणिक संसाधनों की गुणवत्ता को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं। प्रवेश एवं शुल्क नियामक समिति का गठन इसी उद्देश्य से किया गया था कि फीस निर्धारण प्रक्रिया पारदर्शी और निष्पक्ष रहे। समिति के अध्यक्ष उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश द्वारा नामित सेवानिवृत्त न्यायाधीश होते हैं। इसके साथ ही सचिव चिकित्सा शिक्षा, सचिव तकनीकी शिक्षा और सचिव न्याय सदस्य के रूप में शामिल होते हैं। राज्य सरकार द्वारा नामित एक वरिष्ठ सेवानिवृत्त अधिकारी, राज्यपाल द्वारा नामित किसी राज्य विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति और दो प्रतिष्ठित शिक्षाविद भी समिति का हिस्सा होते हैं। अध्यक्ष की ओर से एक चार्टर्ड अकाउंटेंट को भी नामित किया जाता है।

विभागीय सूत्रों के अनुसार समिति की बैठकें नियमित रूप से नहीं हो पाईं और कई बार कोरम पूरा नहीं हो सका। यही कारण रहा कि तय मानकों के अनुरूप फीस संरचना पर अंतिम निर्णय नहीं लिया जा सका। फीस निर्धारण में देरी के चलते न केवल छात्रों और अभिभावकों में असंतोष है, बल्कि सरकार की नियामक व्यवस्था पर भी सवाल उठ रहे हैं। शिक्षा क्षेत्र से जुड़े जानकारों का मानना है कि निजी शिक्षण संस्थानों में फीस निर्धारण की स्पष्ट और पारदर्शी व्यवस्था जरूरी है, ताकि छात्रों का आर्थिक बोझ संतुलित रहे और संस्थानों को भी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने के लिए पर्याप्त संसाधन मिल सकें। अब नजर इस बात पर है कि क्या सरकार समिति को सक्रिय कर निर्धारित समयसीमा के भीतर फीस पुनरीक्षण की प्रक्रिया पूरी कर पाएगी या यह मामला आगे भी लंबित रहेगा।

 

 

 

 

 

Related Post

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *