नई शिक्षा नीति के तहत एनसीईआरटी ने बदला सिलेबस, अब विद्यार्थी जानेंगे आयुर्वेद के वैज्ञानिक पहलू..
उत्तराखंड: राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT) ने देशभर के स्कूली शिक्षा पाठ्यक्रम में बड़ा बदलाव किया है। परिषद ने कक्षा 6 से 8 तक के विज्ञान सिलेबस में अब आयुर्वेद से जुड़े अध्याय शामिल करने का निर्णय लिया है। यह निर्णय राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के मूल विचार पर आधारित है, जिसके तहत शिक्षा को भारतीय ज्ञान परंपरा, विज्ञान और संस्कृति के साथ जोड़ने पर बल दिया गया है। एनसीईआरटी के निदेशक दिनेश प्रसाद सकलानी ने कहा कि इस पहल का उद्देश्य केवल वैज्ञानिक जानकारी देना नहीं, बल्कि विद्यार्थियों को शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक संतुलन के सिद्धांतों से भी अवगत कराना है। उन्होंने कहा कि नई सामग्री छात्रों को स्वास्थ्य, पोषण, पर्यावरण संरक्षण और जीवनशैली के प्रति भारतीय दृष्टिकोण से सोचने और समझने के लिए प्रेरित करेगी।
नई पाठ्यपुस्तकों में छात्रों को यह बताया जाएगा कि कैसे आयुर्वेदिक सिद्धांतों, प्राकृतिक चिकित्सा और संतुलित आहार के माध्यम से शरीर और मन को स्वस्थ रखा जा सकता है। इसमें पौधों से औषधि निर्माण, योग, प्राणायाम और पंचमहाभूत सिद्धांत जैसे विषयों को सरल वैज्ञानिक उदाहरणों के साथ जोड़ा गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस पहल से छात्रों में भारतीय चिकित्सा परंपरा के प्रति रुचि बढ़ेगी और विज्ञान की पढ़ाई अब केवल प्रयोगशाला तक सीमित न रहकर जीवन शैली और व्यवहार विज्ञान से भी जुड़ जाएगी। एनसीईआरटी ने कहा कि नई सामग्री को 2025 के शैक्षणिक सत्र से लागू किया जाएगा और इसे सभी स्कूलों तक चरणबद्ध तरीके से पहुंचाया जाएगा। यह कदम भारत की शिक्षा प्रणाली को स्थानीय ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के समन्वय की दिशा में एक बड़ा परिवर्तन माना जा रहा है।
एनसीईआरटी की नई कक्षा 6 की साइंस किताब में आयुर्वेद के 20 गुण (गुरु, लघु, उष्ण, शीत, स्थिर, चल आदि) जैसे मूलभूत सिद्धांतों को जोड़ा गया है, जो शरीर, स्वास्थ्य और प्रकृति के संतुलन को समझाने में मदद करेंगे। वहीं कक्षा 8 की किताब में ‘दिनचर्या’ और ‘ऋतुचर्या’ जैसे विषय शामिल किए गए हैं, जिनमें छात्रों को बताया जाएगा कि मौसम और दिनचर्या के अनुसार जीवन शैली अपनाने से शरीर और मन कैसे स्वस्थ रहते हैं। एनसीईआरटी के अधिकारियों का कहना है कि ये बदलाव केवल किताबों तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि यह कदम छात्रों को भारत की समृद्ध वैज्ञानिक और आयुर्वेदिक विरासत से प्रेरित करने की दिशा में एक बड़ा प्रयास है। नई शिक्षा नीति (NEP 2020) के अनुरूप यह बदलाव शिक्षा को भारतीय ज्ञान परंपरा और आधुनिक विज्ञान के समन्वय की दिशा में ले जाएगा। एनसीईआरटी का उद्देश्य छात्रों को केवल सैद्धांतिक ज्ञान नहीं देना, बल्कि उन्हें स्वास्थ्य, पोषण, पर्यावरण संतुलन और आत्म-संरक्षण के व्यावहारिक सिद्धांतों से भी परिचित कराना है। परिषद ने संकेत दिए हैं कि आने वाले समय में उच्च शिक्षा स्तर पर भी आयुर्वेद और पारंपरिक चिकित्सा प्रणाली को पाठ्यक्रम में शामिल करने पर विचार किया जा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इससे भारत की युवा पीढ़ी में स्थानीय चिकित्सा परंपराओं, स्वदेशी विज्ञान और स्वास्थ्य जागरूकता के प्रति नई रुचि पैदा होगी। एनसीईआरटी की नई किताबें अगले शैक्षणिक सत्र से देशभर के स्कूलों में लागू की जाएंगी। शिक्षा विशेषज्ञों के अनुसार यह बदलाव बच्चों को विज्ञान के साथ-साथ भारतीय जीवनशैली और प्रकृति आधारित स्वास्थ्य दर्शन को समझने में मदद करेगा। छात्र “Classification of Matter” यानी पदार्थों के वर्गीकरण के साथ-साथ आयुर्वेद के 20 विरोधी गुणों (जैसे गरम–ठंडा, हल्का–भारी, सूखा–गीला आदि) के बारे में जानेंगे। इससे बच्चों को यह समझने में मदद मिलेगी कि शरीर और चीज़ें कैसे एक-दूसरे पर असर डालती हैं और स्वस्थ रहने के लिए संतुलन क्यों ज़रूरी है। आयुर्वेद शरीर, मन और पर्यावरण का संतुलन” नाम से एक नया चैप्टर जोड़ा गया है। इसमें बच्चों को बताया जाएगा कि अच्छी सेहत के लिए दिनचर्या (दैनिक आदतें), ऋतुचर्या (मौसम के अनुसार खानपान) और संतुलित जीवनशैली कितनी ज़रूरी होती है।

