Breaking
Tue. Apr 28th, 2026

मानव-वन्यजीव संघर्ष पर सरकार का नया प्लान, जनप्रतिनिधि और स्थानीय समुदाय होंगे शामिल

मानव-वन्यजीव संघर्ष पर सरकार का नया प्लान, जनप्रतिनिधि और स्थानीय समुदाय होंगे शामिल..

 

 

उत्तराखंड: उत्तराखंड में बढ़ते मानव-वन्यजीव संघर्ष को लेकर अब केवल वन विभाग ही नहीं, बल्कि जनप्रतिनिधियों और स्थानीय समुदायों को भी सक्रिय रूप से मैदान में उतारने की तैयारी शुरू हो गई है। केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के निर्देशों के क्रम में राज्य में इस गंभीर समस्या से निपटने के लिए एक नया सहभागी मॉडल अपनाया जा रहा है, जिसमें संवाद, जागरूकता और स्थानीय भागीदारी पर विशेष जोर दिया गया है। इसी दिशा में वन विभाग ने पहल करते हुए देहरादून में एक कार्यशाला का आयोजन किया। कार्यशाला में जनप्रतिनिधियों, विशेषज्ञों और मानव-वन्यजीव संघर्ष से प्रभावित क्षेत्रों के लोगों से सीधे सुझाव लिए गए। साथ ही मौके पर ही संघर्ष रोकथाम से जुड़े कई महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश भी जारी किए गए।

अब मानव-वन्यजीव संघर्ष को केवल वन विभाग की जिम्मेदारी न मानते हुए इसे सामूहिक प्रयास के रूप में देखा जा रहा है। इसके तहत सांसदों, विधायकों, स्थानीय निकायों, ग्राम सभाओं और सामाजिक संगठनों को जागरूकता अभियानों से जोड़ा जाएगा। निर्णय लिया गया है कि जागरूकता कार्यक्रमों में स्थानीय भाषा का उपयोग किया जाएगा, ताकि संदेश सीधे और प्रभावी रूप से लोगों तक पहुंचे। देहरादून में आयोजित इस कार्यशाला में राज्यसभा सांसद नरेश बंसल और कल्पना सैनी ने भाग लिया। बैठक में मानव-वन्यजीव संघर्ष के संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान, मौजूदा रोकथाम उपाय, तकनीक के उपयोग, मुआवजा प्रणाली और समुदाय आधारित समाधान पर विस्तार से चर्चा की गई। कार्यशाला में यह स्पष्ट किया गया कि अब संघर्ष रोकथाम की रणनीति ऊपर से नीचे नहीं, बल्कि नीचे से ऊपर यानी जमीनी स्तर से तैयार की जाएगी। इसमें गांव, महिला मंगल दल और युवा समूहों की भागीदारी सुनिश्चित की जाएगी।

WWF इंडिया के प्रतिनिधियों ने जानकारी दी कि उत्तराखंड वन विभाग को रेडियो कॉलर उपलब्ध कराए गए हैं, जिनकी मदद से वन्यजीवों की गतिविधियों पर नजर रखी जा सकती है। इनके बेहतर उपयोग से अर्ली वार्निंग सिस्टम विकसित किया जा सकता है, जिससे ग्रामीणों को समय रहते सतर्क किया जा सके। इसके अलावा संवेदनशील गांवों में सोलर लाइट लगाने, उनके नियमित रखरखाव और जंगल की सीमाओं पर फलदार वृक्ष लगाने पर सहमति बनी, ताकि वन्यजीवों को जंगल के भीतर ही भोजन उपलब्ध हो और वे आबादी की ओर न आएं। बैठक में यह भी तय किया गया कि संवेदनशील क्षेत्रों में झाड़ी कटान और लैटाना उन्मूलन का कार्य किया जाएगा, जिसमें ग्राम सभाओं का सहयोग लिया जाएगा। उत्तराखंड में गुलदार के हमलों की बढ़ती घटनाओं को देखते हुए उनकी विशेष गणना (सेंसेस) कराने का सुझाव भी सामने आया, ताकि वास्तविक स्थिति का आकलन कर प्रभावी रणनीति बनाई जा सके।

वन्यजीवों के कारण फसल, पशुधन या जान-माल के नुकसान पर मिलने वाली अनुग्रह राशि को शीघ्र जारी करने पर विशेष जोर दिया गया। तय किया गया कि पीड़ितों को लंबे समय तक इंतजार न करना पड़े, जिससे विभाग के प्रति भरोसा बना रहे। इस दौरान राज्यसभा सांसद कल्पना सैनी ने घोषणा की कि मानव-वन्यजीव संघर्ष की रोकथाम के लिए 12 जिलों में सांसद निधि से प्रत्येक जिले को 5-5 लाख रुपये दिए जाएंगे। इस राशि का उपयोग सोलर लाइट, सुरक्षा उपकरण और अन्य आवश्यक उपायों में किया जाएगा। सरकार और वन विभाग का मानना है कि सामुदायिक भागीदारी और तकनीक आधारित समाधान के जरिए मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाओं में प्रभावी कमी लाई जा सकती है और ग्रामीण इलाकों में सुरक्षित वातावरण तैयार किया जा सकता है।

 

 

 

Related Post

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *