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IIT की तकनीक का असर, पुरानी गोशाला 10 घंटे में बनी हाईटेक हाउस..

IIT की तकनीक का असर, पुरानी गोशाला 10 घंटे में बनी हाईटेक हाउस..

 

 

 

उत्तराखंड: उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में टिकाऊ और पर्यावरण-अनुकूल निर्माण को बढ़ावा देने की दिशा में IIT रुड़की ने एक अभिनव पहल की है। संस्थान ने पारंपरिक हिमालयी वास्तुकला को आधुनिक तकनीक के साथ जोड़ते हुए एक सदी पुरानी क्षतिग्रस्त गोशाला का पुनर्निर्माण कर उसे एक आधुनिक और उपयोगी संरचना में बदल दिया है। यह प्रयोग न केवल तकनीकी दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था और पर्यटन के लिए भी नए रास्ते खोलता नजर आ रहा है। इस परियोजना की सबसे खास बात है हैंपक्रीट पैनलों का उपयोग। यह एक उभरती हुई निर्माण तकनीक है, जिसे कम लागत, टिकाऊ, हल्का और भूकंपरोधी माना जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार, इस तकनीक की मदद से एक पूरा कॉटेज महज 10 घंटे में तैयार किया जा सकता है, जो पारंपरिक निर्माण विधियों की तुलना में कहीं अधिक तेज और प्रभावी है।

पौड़ी के गांव में हुआ सफल प्रयोग

इस नवाचार को ज़मीन पर उतारने के लिए संस्थान के ‘गो-हैंप’ स्टार्टअप ने पौड़ी जनपद के यमकेश्वर ब्लॉक स्थित फल्दाकोट गांव को चुना। यहां करीब 100 साल पुरानी जर्जर गोशाला को नई तकनीक से पुनर्निर्मित किया गया। खास बात यह रही कि निर्माण के दौरान पारंपरिक पहाड़ी शैली को पूरी तरह बरकरार रखा गया, जबकि संरचना को आधुनिक सुविधाओं के अनुरूप विकसित किया गया। इस परियोजना का नेतृत्व वैज्ञानिक और आर्किटेक्ट नम्रता कंडवाल ने किया। उनके नेतृत्व में यह प्रोजेक्ट न केवल तकनीकी रूप से सफल रहा, बल्कि सतत विकास का एक बेहतरीन उदाहरण भी बना। नम्रता कंडवाल को उनके उत्कृष्ट कार्य के लिए Narendra Modi द्वारा ‘ग्लोबल हाउसिंग टेक्नोलॉजी चैलेंज’ में सम्मानित भी किया जा चुका है।

पर्यावरण और रोजगार दोनों को मिलेगा लाभ..

‘गो-हैंप’ स्टार्टअप का उद्देश्य हिमालयी क्षेत्रों में पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देना है। हैंप आधारित निर्माण सामग्री के उपयोग से रेत खनन और पहाड़ों में ब्लास्टिंग जैसी हानिकारक गतिविधियों को कम किया जा सकता है। इसके साथ ही यह तकनीक स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर भी पैदा करेगी। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के कॉटेज को ग्रामीण क्षेत्रों में होम-स्टे मॉडल के रूप में विकसित किया जा सकता है, जिससे पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा और स्थानीय लोगों की आय में वृद्धि होगी।

भविष्य की निर्माण तकनीक की ओर कदम..

इस परियोजना में इस्तेमाल किया गया इंटरलॉकिंग हैंपक्रीट पैनल सिस्टम आधुनिक निर्माण तकनीक का एक बेहतरीन उदाहरण बनकर उभरा है। इससे पुराने और जर्जर ढांचों को नए, सुरक्षित और उपयोगी रूप में बदला जा सकता है। स्टार्टअप का लक्ष्य वर्ष 2030 तक देशभर में 1000 हैंप आधारित भवन तैयार करना है, जो जलवायु-अनुकूल और कम-कार्बन उत्सर्जन वाले होंगे। यह पहल आने वाले समय में निर्माण क्षेत्र में एक नई सोच और दिशा देने का काम कर सकती है। इस नवाचार ने यह साबित कर दिया है कि अगर पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक तकनीक के साथ जोड़ा जाए, तो न सिर्फ टिकाऊ विकास संभव है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक प्रगति को भी साथ-साथ आगे बढ़ाया जा सकता है।

 

 

 

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